छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोककला: एक जीवंत परंपरा की झलक

Jayant verma
0
छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोककला: एक जीवंत परंपरा की झलक
छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोककला


छत्तीसगढ़ न केवल प्राकृतिक सौंदर्य और खनिज संसाधनों के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि इसकी संस्कृति और लोककला भी उतनी ही समृद्ध और विविधतापूर्ण है। यहाँ की परंपराएं, लोकनृत्य, संगीत, त्योहार और पारंपरिक पहनावे इस राज्य की पहचान हैं।


1. लोकनृत्य: आत्मा की अभिव्यक्ति

छत्तीसगढ़ के लोकनृत्य न केवल मनोरंजन के साधन हैं, बल्कि इनमें जनजीवन, आस्था और सामाजिक संदेश छिपे होते हैं।


•  पंथी नृत्य: सतनामी समाज द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य गुरु घासीदास की शिक्षाओं पर आधारित होता है। इसमें समूह में तालबद्ध गति और भक्ति रस देखने को मिलता है।


•  राउत नाचा: गोवर्धन पूजा के समय यादव समुदाय द्वारा किया जाने वाला यह नृत्य वीरता और आत्म-सम्मान का प्रतीक है।


•  सुआ नृत्य: महिलाएं दीपावली के अवसर पर इस नृत्य को करती हैं, जिसमें तोते (सुआ) की कथा गाई जाती है।


•  करमा नृत्य: यह आदिवासी समुदाय का प्रमुख नृत्य है, जो करम देवता की पूजा करते हुए किया जाता है।


2. लोकसंगीत: जीवन की धड़कन

छत्तीसगढ़ी लोकसंगीत में ढोल, मृदंग, नगाड़ा, बाँसुरी जैसे वाद्य यंत्रों का प्रयोग होता है। गीतों में खेती, ऋतु परिवर्तन, प्रेम, भक्ति और सामाजिक मुद्दों की झलक मिलती है।


•  देवारी गीत – देवी-देवताओं की स्तुति के लिए गाया जाता है।


•  फाग गीत – फाल्गुन मास में होली के समय गाया जाता है।


•  भजन और आरती – ग्रामीण क्षेत्रों में धार्मिक अवसरों पर विशेष रूप से गाए जाते हैं।


3. लोकत्योहार: संस्कृति का उत्सव

छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले त्योहारों में स्थानीय परंपराएं और प्रकृति के साथ जुड़ाव झलकता है।


•  हरेली: खेती-बाड़ी से जुड़ा यह त्योहार कृषि उपकरणों की पूजा के लिए मनाया जाता है।


•  तीजा: विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए उपवास करती हैं और गीत-नृत्य करती हैं।


•  मड़ई उत्सव: यह आदिवासी समुदायों द्वारा आयोजित मेला होता है, जहाँ गीत, नृत्य, खान-पान और हस्तशिल्प की झलक मिलती है।


•  गोवर्धन पूजा: राउत नाचा के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व छत्तीसगढ़ की वीर परंपरा का प्रतीक है।


4. पारंपरिक पहनावा: संस्कृति की पहचान

छत्तीसगढ़ के पारंपरिक वस्त्र न केवल जलवायु के अनुकूल हैं, बल्कि इनमें सौंदर्य और सांस्कृतिक भाव भी झलकता है।


•  महिलाएं: पारंपरिक लुगड़ा और कांची पहनती हैं, साथ ही चांदी के गहनों जैसे बैल-बुटी, करधन, बाजूबंद आदि का प्रयोग करती हैं।


•  पुरुष: धोती, कुर्ता और गमछा पहनते हैं। त्योहारों पर रंग-बिरंगी पगड़ियां भी आम हैं।


निष्कर्ष:

छत्तीसगढ़ की संस्कृति और लोककला उस धरती की आत्मा है, जहाँ लोग प्रकृति, परंपरा और आध्यात्मिकता के साथ सामंजस्य में जीवन जीते हैं। यह धरोहर न केवल राज्य की पहचान है, बल्कि सम्पूर्ण भारत की विविधता का अद्भुत उदाहरण भी है।



Post a Comment

0Comments

Post a Comment (0)